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मानसिक तनाव और पेट की बीमारियां / “कार्यात्मिक पेट व आंत की बीमारी”

मानसिक तनाव का पाचनक्रिया के आंतरिक लिंक है| वह एक दुसरे से बातचीत करते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं| यह जो बातचीक होती है दिमाग और पाचन क्रिया (पेट) के बीच मैं उसको बोलते हैं “दिमाग-पेट की अक्षरेखा”|

यह दिमाग-पेट की आंतरिक लिंक से उत्पन होने वाली पेट की बिमारियों को कार्यात्मिक पेट आंत की बीमारी कही जाती है| इसमें शामिल है इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम (IBS), एसिडिटी, गैस, कब्ज और दस्त जैसी तकलीफें| इनको कार्यात्मिक इसलिए बोलते हैं क्यूंकि पेट के अंगों की रचना बरकरार रहती है| पेट के अंगों मैं कोई शारीरिक खामी नहीं होती| पेट मैं लक्षण होने के बावजूद रिपोर्ट नोर्मल आती है|

दिमाग पाचन क्रिया को कैसे प्रभावित करता है?

दिमाग वेगस नामक नस (तंत्रिका) के द्वारा पेट, छोटी आंत और बड़ी आंत को प्रभावित करती है| वह पाचन क्रिया मैं स्राव, एसिड, पित्त, आंत की हलन-चलन, मलत्याग आदि जैसे पहलुओं का नियंत्रण करता है| 

दिमाग से हॉर्मोन भी निकलते हैं जैसे ACTH . यह इम्यून कार्य को सक्रिय करता है और इससे आंत मैं सूजन हो सकता है|

उद्धरण से – जिस दिन मानसिक तनाव हो जैसे की परीक्षा का दिन, नौकरी के लिए इंटरव्यू, ज़रूरी मीटिंग, भीड़ के बीच मैं भाषण देना वगेरे, उस वक़्त पेट मैं बेचैनी जैसा महसूस होना|

संक्षेप में, मानसिक तनाव और मनोदशा से पेट की क्रिया पे प्रभाव होता है| जीवन की कठिन घटनाएं जैसे की किसी नज़दीकी परिवारजन को खोना, शादी या रिश्ता टूटना, काम पे या धंधे मैं घाटा, शोषण, बड़ा अकस्मात् वगेरे से दिमाग तनाव के लिए संवेदनशील हो जाता है, जिसके असर पंचन क्रिया पे पड़ता है|

पाचन क्रिया दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?

आंत मैं सैंकड़ो करोडो सूक्ष्म जीव होते हैं| यह ज़्यादातर बैक्टीरिया होते हैं, पर इसमें वायरस, फंगस वगेरे भी शामिल हैं| इसमें से कुछ अच्छे कीटाणु होते हैं और कुछ नुकसान पहुँचाने वाले| यह सूक्ष्म जीव की मात्रा से और अच्छे-बुरे के संतुलन मैं फर्क पड़ने से दिमाग पे प्रभाव पड़ता है| 

पेट से दिमाग पे प्रभाव पेट की नसों के द्वारा, होर्मोनेस के द्वारा और कुछ रसायन के द्वारा होता है| 

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स्वस्थ आंत में अच्छे कीटाणु होते हैंअस्वस्थ अन्य में हानिकारक कीटाणु होते हैं

इसका उद्धरण – जब पेट में कीटाणु का संक्रमण होता है और बुखार और दस्त लगती है, तब मनोदशा ऐसी होती है की कुछ भी काम करने का मन नहीं होता|

आंकड़े क्या बताते हैं?

यह “कार्यात्मिक पेट व आंत की बीमारी”, जिसमे शामिल है इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम, एसिडिटी, गैस, कब्ज और दस्त जैसी तकलीफें, इनमें ४०-६०% दर्दियों को डिप्रेशन या अधिक तनाव की समस्या रहती है|

सिम्स अस्पताल में मैंने पेट की बिमारियों पे अनुसंधान किया था और मैंने पता लगाया की हर ३ में से १ दर्दी को डिप्रेशन या अधिक तनाव की बीमारी है|

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मानसिक तनाव से पेट की बीमारी में बढ़ावा कैसे होता है?

मानसिक तनाव से पेट की नसों में अति संवेदनशीलता होती है| इसकी वजह से दर्दी को वास्तविक से ज़्यादा दर्द या गैस का एहसास होता है| उद्धरण से – साधारण तौर से खाने के बाद पेट भर जाता है| नोर्मल लोगों को यह महसूस होता है पर इससे परेशानी नहीं होती और अपना काम करते रहते हैं| मानसिक तनाव के दर्दी को वही भोजन के बाद पेट भरने के एहसास से ज़्यादा परेशानी होती है और वह अपना काम नहीं कर सकते| उनको यह अधिक गैस और पेट फूलने जैसा महसूस होता है| इसको पेट की नसों में अति संवेदनशीलता (visceral hypersensitivity) बोलते हैं|

मानसिक तनाव के दर्दी को पेट के हलन-चलन का अधिकतर एहसास होता है| यह हलन-चलन सब लोगों में होती है, पर अति संवेदनशीलता की वजह से कुछ लोगों को ज़्यादा महसूस होती है और तकलीफ होती है| इन दर्दियों को पूरा दिन खुद की शरीर की क्रिया पे ज़्यादा ध्यान रहता है| पेट के साधारण हलन-चलन में उनको दर्द के एहसास होता है| 

सबके पेट में साधारण मात्रा में गैस होती है| पर यह महसूस नहीं होती और तकलीफ नहीं देती|
कार्यात्मिक पेट व आंत की बीमारी के दर्दी को साधारण गैस से भी तकलीफ होती है और उनको गैस और भारीपन का एहसास होता है|

“कार्यात्मिक पेट व आंत की बीमारियां” तनाव की वजह से उत्पन नहीं होती है, पर तनाव की वजह से उसको बढ़ावा मिलता है| तनाव के अलावा बहोत सारे कारन होते हैं जैसे की जेनेटिक्स (आनुवंशिकी), आंत की गतिशीलता हैं फर्क, खोराक वगेरे जो भी पेट की बिमारियों के लक्षण को बढ़ावा देता है| 

तनाव की पहचान होने से इसका इलाज किया जा सकता है|

पहचान करें कैसे?

कुछ लोग मानसिक तनाव को पहचान लेते हैं और कुछ दर्दी आसानी से नहीं पहचान सकते| 

पेट के लक्षण और मनोदशा का विश्लेषण करके इसके बारे में मालूम किया जा सकता है|

मानसिक रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर से मुलाकात करनी चाहिए|

इसका इलाज कैसे होता है?

  • ध्यान करने से और योग करने से
  • कम से कम ७-८ घंटे सोना चाहिए| अगर नींद में तकलीफ होती है तो दवाई से मदद मिल सकती है|
  • डॉक्टर के द्वारा और दर्दी जिनको यह तकलीफ थी, उनसे संपर्क करके बात करें
  • नियमित व्यायाम करें
  • मानसिक रोग के स्पेशलिस्ट डॉक्टर से मुलाकात लें
  • दवाइया ले

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